उपशीर्षक : खातेगांव थाना प्रभारी दिलीप पुरी की मौत ने मध्य प्रदेश में अवैध शराब के कारोबार, माफिया के बढ़ते हौसलों और सरकारी तंत्र की जवाबदेही पर खड़े किए गंभीर सवाल।
नरेंद्र धनोतिया मध्य भारत मीडिया
संपादकीय
मंदसौर। मध्य प्रदेश के देवास जिले के खातेगांव में थाना प्रभारी दिलीप पुरी की दर्दनाक मौत ने पूरे प्रदेश को झकझोर कर रख दिया है। अवैध शराब की तस्करी रोकने निकली पुलिस टीम के थाना प्रभारी को शराब से भरे वाहन ने कुचल दिया। कर्तव्य निभाते हुए एक पुलिस अधिकारी की जान चली जाना केवल एक परिवार की व्यक्तिगत क्षति नहीं, बल्कि प्रदेश की कानून व्यवस्था के सामने खड़ी गंभीर चुनौती है।
प्रारंभिक जानकारी के अनुसार,1- 2 नवंबर की रात करीब डेढ़ से दो बजे के बीच पुलिस को अवैध शराब से भरे वाहन के परिवहन की सूचना मिली थी। देवास के पुलिस अधीक्षक आदित्य मिश्रा ने इस कार्रवाई के लिए पांच से अधिक पुलिस टीमें गठित की थीं। इनमें कन्नौद, सतवास और खातेगांव के थाना प्रभारी सहित पुलिसकर्मी शामिल थे।
पुलिस टीम संदिग्ध आयशर वाहन को रोकने पहुंची। खातेगांव थाना प्रभारी दिलीप पुरी ने चालक को वाहन से नीचे उतरने के लिए कहा। पुलिस के अनुसार, चालक ने वाहन लेकर भागने का प्रयास किया। इसी दौरान वाहन का पिछला पहिया दिलीप पुरी के ऊपर से गुजर गया। गंभीर रूप से घायल थाना प्रभारी को अस्पताल पहुंचाया गया, लेकिन उन्हें बचाया नहीं जा सका।
वाहन से 1,800 लीटर से अधिक अवैध शराब बरामद होने और परिवहन का वैध परमिट नहीं मिलने की जानकारी सामने आई है। यह तथ्य अपने आप में इस कारोबार की गंभीरता को उजागर करता है।
एक पुलिस अधिकारी अपराध रोकने निकला था, लेकिन अपराधियों के दुस्साहस ने उसकी जान ले ली। आखिर प्रदेश में अवैध शराब के कारोबारियों के हौसले इतने बुलंद कैसे हो गए?
सवाल सिर्फ ट्रक चालक का नहीं, पूरे नेटवर्क का है
इस घटना को केवल एक ट्रक चालक की आपराधिक हरकत मानकर जांच समाप्त कर देना सबसे बड़ी भूल होगी। ट्रक चलाने वाला व्यक्ति इस पूरे कारोबार की एक कड़ी हो सकता है। असली सवाल यह है कि शराब कहां से आई, किसने उपलब्ध कराई, किसके माध्यम से परिवहन किया जा रहा था और इसके पीछे आर्थिक रूप से कौन लोग जुड़े हैं?
पुलिस अधीक्षक आदित्य मिश्रा ने बताया है कि शराब की खेप के स्रोत के संबंध में प्रारंभिक जांच में हरदा की एक वाइन शॉप का नाम सामने आया है। हालांकि शराब कहां पहुंचाई जानी थी और इस कारोबार में कौन-कौन शामिल हैं, इसकी जांच जारी है।
विशेष पुलिस महानिदेशक उपेंद्र जैन ने 2 नवंबर को जानकारी दी कि पुलिस ने तस्करी की पूरी कड़ी से जुड़े लोगों की पहचान की है और पांच जिलों में टीमें सक्रिय हैं। यह निश्चित रूप से महत्वपूर्ण जानकारी है, लेकिन अब असली परीक्षा इस नेटवर्क के सभी जिम्मेदार लोगों को कानून के दायरे में लाने की है।
क्या केवल वाहन चालक और छोटे स्तर के लोगों पर कार्रवाई होगी या शराब के स्रोत से लेकर इसके पीछे आर्थिक रूप से जुड़े बड़े चेहरों तक जांच पहुंचेगी?
यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अवैध शराब का कारोबार किसी एक व्यक्ति के दम पर लंबे समय तक नहीं चल सकता। इसके लिए आपूर्ति, परिवहन, बिक्री और आर्थिक लेनदेन की पूरी व्यवस्था काम करती है।
देवास में पहले भी उठ चुके हैं अवैध शराब के सवाल
देवास जिले में हाल ही में चंदाना, बीजाना और आसपास के गांवों में संदिग्ध शराब सेवन के बाद कई लोगों की मौतों की खबरें सामने आई थीं। ग्रामीणों ने जहरीली शराब से मौत होने के आरोप लगाए थे। इस मामले में पुलिस ने अवैध शराब की बिक्री और कथित मिलावटी शराब तैयार करने के नेटवर्क की जांच की। कई गिरफ्तारियां हुईं और आबकारी विभाग के अधिकारियों पर भी कार्रवाई की गई।
घटना के बाद देवास के तत्कालीन कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक का तबादला किया गया तथा आबकारी विभाग के अधिकारियों को निलंबित किया गया।
इन घटनाओं के बीच अब अवैध शराब की खेप पकड़ने के अभियान में एक थाना प्रभारी की मौत हो जाना व्यवस्था के सामने और गंभीर सवाल खड़े करता है।
जब एक जिले में अवैध शराब के कारोबार को लेकर लगातार शिकायतें और कार्रवाई हो रही हों, तब इतनी बड़ी मात्रा में शराब का परिवहन कैसे संभव हो रहा था? क्या निगरानी व्यवस्था पर्याप्त थी? क्या शराब के कारोबार से जुड़े सभी स्रोतों की जांच की गई थी?
इन सवालों के जवाब केवल पुलिस नहीं, आबकारी विभाग और जिला प्रशासन को भी देने चाहिए।
सरकार की संवेदना के साथ जवाबदेही भी जरूरी
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने थाना प्रभारी दिलीप पुरी की मौत पर गहरा दुख व्यक्त किया है। उन्होंने निष्पक्ष जांच के निर्देश देते हुए विशेष पुलिस महानिदेशक उपेंद्र जैन को घटनास्थल पर भेजा।
मुख्यमंत्री ने दिवंगत थाना प्रभारी की पत्नी को अनुकंपा नियुक्ति के तहत उप निरीक्षक पद देने और परिवार को एक करोड़ रुपये की आर्थिक सहायता देने की घोषणा भी की है।
सरकार का यह कदम संवेदनशीलता दर्शाता है। लेकिन किसी पुलिस अधिकारी के परिवार को आर्थिक सहायता देना ही शासन की पूरी जिम्मेदारी नहीं है।
दिलीप पुरी के परिवार को न्याय मिलना चाहिए। साथ ही यह सुनिश्चित करना होगा कि भविष्य में किसी अन्य पुलिस अधिकारी को अपराधियों के ऐसे दुस्साहस का शिकार न होना पड़े।
पुलिसकर्मियों की सुरक्षा, पर्याप्त संसाधन, जोखिमपूर्ण कार्रवाई के दौरान सुरक्षा इंतजाम और माफिया के विरुद्ध प्रभावी रणनीति पर गंभीरता से काम करने की जरूरत है।
खाकी के सम्मान के लिए निर्णायक कार्रवाई जरूरी
यह घटना पुलिस विभाग के लिए भी आत्ममंथन का अवसर है। हाईवे पर संदिग्ध वाहनों को रोकने, नाकाबंदी करने, पुलिस टीमों के बीच समन्वय और ऐसे अभियानों के दौरान सुरक्षा के इंतजामों की समीक्षा होनी चाहिए।
अवैध शराब के खिलाफ अभियान केवल छापेमारी और जब्ती तक सीमित नहीं रहना चाहिए। शराब के स्रोत, परिवहन, आर्थिक लेनदेन और बिक्री की पूरी कड़ी को तोड़ना होगा।
यदि किसी अधिकारी, कर्मचारी, कारोबारी या प्रभावशाली व्यक्ति की संलिप्तता सामने आती है तो उसके खिलाफ भी बिना किसी दबाव के कार्रवाई होनी चाहिए। हालांकि किसी व्यक्ति को केवल आरोप या चर्चा के आधार पर दोषी नहीं ठहराया जा सकता। जांच में सामने आए प्रमाण ही कार्रवाई का आधार होने चाहिए।
मध्य भारत मीडिया का स्पष्ट मत
खातेगांव थाना प्रभारी दिलीप पुरी की मौत प्रदेश की कानून व्यवस्था के लिए एक चेतावनी है। यह घटना बताती है कि अवैध कारोबार के खिलाफ लड़ाई कितनी चुनौतीपूर्ण हो चुकी है।
सरकार को चाहिए कि पूरे प्रदेश में अवैध शराब के कारोबार की समीक्षा कराए। पुलिस और आबकारी विभाग की जवाबदेही तय हो। शराब की अवैध आपूर्ति और परिवहन करने वाले पूरे नेटवर्क को चिह्नित कर उसके विरुद्ध कठोर कार्रवाई की जाए।
यह लड़ाई किसी एक ट्रक, एक चालक या एक जिले तक सीमित नहीं होनी चाहिए। यह लड़ाई उस पूरे माफिया तंत्र के खिलाफ होनी चाहिए, जो अवैध शराब से पैसा कमाने के लिए कानून और इंसानी जिंदगी तक को चुनौती देने से नहीं हिचकता।
आज सवाल केवल यह नहीं है कि दिलीप पुरी की जान किसने ली, बल्कि यह भी है कि जिस अवैध कारोबार को रोकने के लिए उन्हें अपनी जान गंवानी पड़ी, वह कारोबार आखिर किन लोगों के दम पर चल रहा है?
क्या मध्य प्रदेश में कानून का राज चलेगा या माफिया का?
दिलीप पुरी अब हमारे बीच नहीं हैं। उनके परिवार की पीड़ा की भरपाई कोई आर्थिक सहायता नहीं कर सकती। लेकिन उनकी शहादत को सार्थक तभी माना जाएगा, जब अवैध शराब के कारोबार की जड़ें काटी जाएंगी, दोषियों को कठोर सजा मिलेगी और पुलिसकर्मियों की सुरक्षा सुनिश्चित होगी।
दिलीप पुरी को सच्ची श्रद्धांजलि केवल श्रद्धांजलि सभाओं और पुष्पांजलि से नहीं, बल्कि शराब माफिया के पूरे नेटवर्क को ध्वस्त करने और कानून का भय स्थापित करने से मिलेगी।
वर्दी का सम्मान होना चाहिए और कानून को चुनौती देने वालों को यह स्पष्ट संदेश मिलना चाहिए कि अपराध कितना भी बड़ा हो, कानून से ऊपर कोई नहीं है।
— संपादकीय
मध्य भारत मीडिया








